चीन पर निर्भरता कम करना चाहता है म्यांमार
myanmar india relations : अप्रैल में पद संभालने वाले म्यांमार के राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग का अपनी पहली आधिकारिक विदेश यात्रा पर भारत आना कूटनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है. सैन्य शासन के दौरान म्यांमार चीन पर अधिक निर्भर है. इसके बावजूद ह्लाइंग ने अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए भारत को चुना. यह बात कुछ चीनी विश्लेषकों तथा वहां के मीडिया को नागवार लगी. इसे जहां म्यांमार की विदेश नीति में ‘संतुलन कूटनीति’ बताया गया, तो कुछ चीनी विश्लेषकों ने इसे म्यांमार द्वारा विकल्प चुनने या नयी पोजीशन लेने की रणनीति के तौर पर देखा है.
हालांकि, व्यापक चीनी नजरिये के अनुसार, म्यांमार का सैन्य शासन दो बड़े पड़ोसियों के बीच संतुलन बनाकर अपनी स्थिति मजबूत करना चाहता है. एक तरफ वह चीन से आर्थिक मदद लेता रहेगा, वहीं भारत से सुरक्षा सहयोग और राजनयिक समर्थन हासिल करना चाहता है. चीनी विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि म्यांमार से उनके आर्थिक और सामरिक संबंध इतने गहरे हैं कि राष्ट्रपति ह्लाइंग की यह यात्रा चीन-म्यांमार संबंधों को ज्यादा प्रभावित नहीं करेगी. उनका मानना है कि म्यांमार न चीन को नाराज करेगा, न ही भारत को. परंतु दीर्घावधि में भारत-चीन प्रतिस्पर्धा म्यांमार में और तेज होगी, जैसा कि हमने श्रीलंका में देखा है. अभी म्यांमार दो महाशक्तियों के बीच संतुलन बनाकर अपने हितों को साध रहा है, लेकिन यह लंबे समय तक नहीं चलने वाला.
तीन ऐसे मुद्दे हैं, जो म्यांमार को भारत के नजदीक ले आये हैं. पहला है, उत्तर म्यांमार के काचिन राज्य की दुर्लभ खनिज पदार्थों की खदानें, जिनकी भारत को बड़ी जरूरत है, जबकि म्यांमार इन........
