झीलों को बीमार कर रहा है माइक्रोप्लास्टिक
Microplastics : शहरों की जीवनरेखा कही जाने वाली झीलें, आज माइक्रोप्लास्टिक की गिरफ्त में हैं. यह प्रदूषण केवल तैरते हुए प्लास्टिक के बैग या बोतलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन सूक्ष्म कणों का जाल है, जो हमारी आंखों से ओझल होकर जल, जीवन और भविष्य को निगल रहा है. हाल के वर्षों में हुए वैश्विक और भारतीय शोधों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि शहरी झीलों में जमा हो रहा यह कचरा एक गंभीर पारिस्थितिकीय आपातकाल है. अंतराष्ट्रीय शोध पत्रिका ‘एनवायर्नमेंटल साइंस : एडवांसेज’ के ताजे अंक में श्रीनगर की डल झील में माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण के बढ़ते प्रकोप पर एक शोध प्रकाशित हुआ है, जिसके चलते शहरी जल निधियों के जहरीले होने की तीव्र गति का पता चलता है.
आइआइटी, खड़गपुर की शोधकर्ता सुधा गोयल की मानें, तो लगातार बारिश ने न केवल माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा बढ़ा दी है, बल्कि स्टॉर्म वाटर निकासी के पास पॉली विनाइल क्लोराइड, पॉलीयुरेथेन और एक्रिलोनाइट्राइल ब्यूटाडीन स्टाइरीन (एक थर्मोप्लास्टिक) जैसे अधिक खतरनाक पॉलिमर भी पाये गये हैं. इन रसायनों ने झील के पानी की विषाक्तता को और बढ़ा दिया है. कुछ ऐसे ही शोध भोपाल के भोज वेटलैंड में भी हुए थे, जिससे पता चला कि वहां के पानी में 2.4 से 6.6 कण प्रति लीटर........
