यूजीसी का इक्विटी फार्मूला: समाधान या समस्या, पढ़ें मिहिर भोले का आलेख
मिहिर भोले, पूर्व प्रोफेसर, राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान, अहमदाबाद
UGC: देश में चल रहे मौजूदा यूजीसी विवाद पर कुछ लिखने से पहले बतौर एक शिक्षक अपनी एक वो बात कहना चाहता हूं, जिसे मैं हमेशा अपने विद्यार्थियों के सामने दुहराता रहा हूं. आमतौर पर किसी के प्रति भेदभावपूर्ण व्यवहार का कारण ईर्ष्या या द्वेष होता है. अमूमन व्यक्ति किसी को अपने से आगे या बेहतर देखना पसंद भी नहीं करता है. लेकिन हर सिद्धांत की तरह इसका भी अपवाद है. व्यक्ति जब अपनी संतान या शिक्षक अपने छात्रों को अपने से आगे निकलता देखता है तो उसे ईर्ष्या की जगह गौरव महसूस होता है. इस हार में उसे अपनी जीत दिखती है. इसका कारण यह है कि दोनों के व्यक्तित्व को गढ़ने और निखारने में उसकी बड़ी भूमिका होती है. परिणामस्वरूप, उनकी उपलब्धियों में उसे कहीं न कहीं अपनी परछाई दिखती है. मेरी तरह ही वे असंख्य शिक्षक, जिन्होंने अपने छात्रों को अपनी संतान की तरह गढ़ा है, चाहे वो जिस भी जाति या समुदाय से आते हों, उनकी भी ऐसी ही भावना होती होगी. एक बड़े क्लासरूम में जब आप कई छात्र-छात्राओं को पढ़ाते हैं या वर्षों तक उनके रिसर्च के गाइड या मेंटर होते हैं तो आपके लिए उनकी सिर्फ एक ही जाति होती है और वो है छात्र की. सामान्यतः छात्र भी आपसे तभी जुड़ते हैं जब वो आपके ज्ञान और कमिटमेंट से प्रभावित होते हैं, न कि आपकी जाति से.
अब जरा यूजीसी के नये विनियम लागू होने के बाद की स्थिति की कल्पना करें. बारहवीं पास कर कॉलेज में आया एक छात्र जो स्कूल के अनुशासित माहौल से अलग एक खुले माहौल में नये विषय सीखने, नये प्रयोग करने, नयी दक्षताएं........
