स्त्री सुरक्षा के लिए केवल कानून बनाना काफी नहीं

Women Safety : देश में जब भी किसी महिला, युवती या बच्ची के साथ हिंसा की कोई वीभत्स घटना सामने आती है, समाज अचानक विचलित दिखाई देने लगता है. समाचार चैनलों पर तीखी बहस शुरू हो जाती है, सोशल मीडिया पर आक्रोश उमड़ पड़ता है, राजनीतिक दल बयान देते हैं, सड़कों पर मोमबत्तियां जलती हैं और कुछ दिनों तक ऐसा लगता है, जैसे पूरा देश स्त्री सुरक्षा को लेकर गंभीर हो उठा है, पर समय बीतते ही वही समाज फिर सामान्य हो जाता है. प्रश्न यह है कि आखिर ऐसा क्यों है कि हर बड़ी घटना के बाद हमारा आक्रोश क्षणिक साबित होता है, जबकि समस्या लगातार बनी रहती है? दरअसल, स्त्री के खिलाफ हिंसा को हमने लंबे समय तक केवल कानून और अपराध के दायरे में सीमित करके देखने की कोशिश की है, जबकि यह समस्या कहीं अधिक गहरी और जटिल है.

झारखंड राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष के रूप में काम करते हुए मुझे हजारों महिलाओं और युवतियों की पीड़ा को नजदीक से देखने का अवसर मिला था. वहां आने वाली महिलाएं केवल कानूनी मदद नहीं चाहती थीं, वे सुने जाने की आकांक्षा भी लेकर आती थीं. हिंसा से भी अधिक उन्हें समाज की प्रतिक्रिया तोड़ देती है. विशेष रूप से वे महिलाएं, जिन्होंने अपने ऊपर हो रहे अत्याचार के खिलाफ पुलिस, अदालत या........

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