दहेज देने और उत्पीड़न के ठोस साक्ष्य से ही सख्त सजा संभव, पढ़ें सीमा जोशी का आलेख

सीमा जोशी, एडवोकेट, दिल्ली हाई कोर्ट

Dowry And Harassment Case: ग्रेटर नोएडा और भोपाल की हालिया दहेज मृत्यु घटनाएं दोहरा रही हैं कि देश के दहेज‑विरोधी कानून कागज पर कितने भी कड़े क्यों न हों, जमीनी स्तर पर उनका निवारक असर दुर्लभ और अस्थायी लगता है. दोनों मामलों में नवविवाहिताएं विवाह के कुछ ही महीनों के भीतर संदिग्ध परिस्थितियों में मरीं, और दहेज‑उत्पीड़न के गंभीर आरोप मृत्यु के बाद सामने आए. इसका अर्थ यह नहीं कि कानून नहीं हैं, बल्कि अर्थ यह है कि कानून के पाठ और न्यायालय की प्रक्रिया के बीच गहरी खाई बनी हुई है, जिसके कारण दहेज हत्या अक्सर ऐसी घटना बनकर रह जाती है, जहां सख्त सजा मिलती तो है, पर दहेज हत्याओं को रोका नहीं जा पा रहा.

दहेज‑मृत्यु के लिए अब बीएनएस में धारा 80 बन गयी, जिसके तहत विवाह के लगभग सात वर्ष के भीतर दहेज‑आधारित उत्पीड़न के कारण हुई मृत्यु पर न्यूनतम सात वर्ष एवं अधिकतम आजीवन कारावास का प्रावधान है. साथ ही, बीएनएस के तहत धारा 85 दहेज‑आधारित क्रूरता व उत्पीड़न को दंडनीय बनाती है, जबकि दहेज निषेध अधिनियम, 1961 दहेज देने और लेने पर प्रतिबंध लगाता है. न्यायालय कई बार स्पष्ट कर चुके हैं कि दहेज मृत्यु के लिए अभियोजन को उत्पीड़न और मृत्यु........

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