संवेदनशील कथानक के साथ बुनी गयी है फिल्म 'अस्सी'

रवीन्द्र त्रिपाठी, फिल्म समीक्षक

भारत के संविधान ने देश की स्त्रियों को कई ऐसे लोकतांत्रिक अधिकार दिये हैं, जो पहले उनके पास नहीं थे. नारीवाद जैसी धारणा भी पिछले कई बरसों में बलवती होती गयी है, जो पितृसत्तात्मक सत्ता को चुनौती देती रही है. पर इसका अर्थ यह नहीं है कि आज के भारत में महिलाएं पूरी तरह सुरक्षित हैं. कुछ मामलों में वे पहले से ज्यादा वेध्य और असुरक्षित होती जा रही हैं. अनुभव सिन्हा की नयी फिल्म ‘अस्सी’ इसी की कथा है. हालांकि यह सिर्फ विषय की वजह से हमें नहीं झकझोरती, बल्कि अपनी कलात्मक विशिष्टताओं के कारण भी इसमें ऐसी उत्कृष्टताएं आ गयी हैं, जो हाल की बहुत कम फिल्मों में दिखी हैं. हमारे शहर, खासकर बड़े महानगर, किस प्रकार गाड़ियों की बहुतायत से लगातार आत्मिक स्तर पर कुचले जा रहे हैं और उनमें संवेदनहीनता बढ़ती जा रही है, उसे भी यह रेखांकित करती है.

कहानी शुरू होती है परिमा (कनी कुस्रुती) से, जो एक स्कूल में पढ़ाती है.........

© Prabhat Khabar