म्यांमार के राष्ट्रपति की भारत यात्रा: रणनीतिक विकल्पों की तलाश!
राष्ट्रपति मिन आंग ह्लाइंग की भारत यात्रा कई मायनों में महत्वपूर्ण रही है, विशेषकर ऐसे समय में जब म्यांमार की नई सरकार की वैधता को अभी भी वैश्विक स्तर पर पूरी तरह स्वीकार नहीं किया गया है। वहीं, म्यांमार में जारी गृह युद्ध का प्रभाव भारत के सीमा प्रबंधन पर भी पड़ रहा है, क्योंकि उसे शरणार्थियों की बढ़ती संख्या के साथ-साथ नशीले पदार्थों और हथियारों की तस्करी जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। दूसरी ओर, चीन और रूस म्यांमार के प्रमुख साझेदार और उसके महत्वपूर्ण रणनीतिक और सामरिक सहयोगियों के रूप में उभरे हैं। इसके बावजूद, इस बात के स्पष्ट संकेत हैं कि भारत म्यांमार के लिए एक महत्वपूर्ण साझेदार बना रहेग, जिसके संकेत म्यांमार भी दे रहा है। ऐसे में, अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा और क्षेत्रीय प्रभाव को बनाए रखने के लिए भारत को म्यांमार की नई सरकार के साथ अपने बहुआयामी संबंधों को और अधिक सुदृढ़ करना चाहिए।
अप्रैल 2026 में राष्ट्रपति पद संभालने वाले म्यांमार के राष्ट्रपति मिन आंग ह्लाइंग ने जून 2026 की शुरुआत में बतौर राष्ट्रपति भारत की अपनी पहली विदेश यात्रा पूरी की। उनकी भारत यात्रा 30 मई को बिहार के गया स्थित महाबोधि मंदिर में पूजा-अर्चना के साथ शुरू हुई। इसके बाद वह नई दिल्ली पहुंचे, जहां उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ आधिकारिक वार्ता की। इसके पश्चात वह मुंबई गए, जहां उन्होंने व्यापार जगत के प्रमुख प्रतिनिधियों से मुलाकात की। इस दौरान निवेश की संभावनाओं तथा दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों को और मजबूत बनाने के उपायों पर चर्चा हुई। प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ह्लाइंग के बीच हुई वार्ता में व्यापार, संपर्क (Connectivity), रक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) और अंतरिक्ष अनुसंधान जैसी उन्नत प्रौद्योगिकियों में सहयोग सहित विभिन्न विषयों पर चर्चा हुई। इसके अलावा, दोनों नेताओं ने म्यांमार से भारत आने वाले शरणार्थियों, साइबर अपराध, कनेक्टिविटी परियोजनाओं और व्यापक सुरक्षा सहयोग से जुड़े मुद्दों पर भी विचार-विमर्श किया।[1] अपनी यात्रा के दौरान ऊर्जा क्षेत्र के प्रतिनिधियों के साथ बैठकों में राष्ट्रपति ह्लाइंग ने हरित हाइड्रोजन (Green Hydrogen), सौर ऊर्जा (Solar Power) और कार्बन कैप्चर जैसी आधुनिक – पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों की जानकारी प्राप्त की। उन्होंने भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से भी मुलाकात की, जहां दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत बनाने पर सार्थक चर्चा की।[2]
म्यांमार राष्ट्रपति की यह यात्रा कई वजहों से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। 2021 से म्यांमार में जारी गृहयुद्ध का बुरा असर दोनों देशों के बीच लगभग 1,643 किलोमीटर लंबी सीमा पर भी पड़ा है। भारतीय विदेश मंत्रालय कहता रहा है कि नई दिल्ली म्यांमार में स्थायी शांति और सभी पक्षों को शामिल करने वाली राजनीतिक प्रक्रिया का समर्थन करता है। भारत का मानना है कि बातचीत और संवाद ही इस समस्या के समाधान का सबसे प्रभावी रास्ता है। इस दौरे की सबसे महत्वपूर्ण बातों में से एक था ‘आश्वासन’। दरअसल, फरवरी 2021 के बाद से म्यांमार की सैन्य सरकार (जुंटा) के प्रमुख रहे राष्ट्रपति ह्लाइंग ने भारत को भरोसा दिलाया कि म्यांमार की ज़मीन का इस्तेमाल भारत के सुरक्षा हितों के खिलाफ नहीं होने दिया जाएगा।
भारत के पहले दौरे का संदर्भ
भारत और म्यांमार के बीच द्विपक्षीय संबंधों का विस्तार कई क्षेत्रों तक फैला हुआ है। इनमें ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और रणनीतिक आयाम शामिल हैं। हालांकि, पिछले लगभग तीन दशकों में इन संबंधों में रणनीतिक मामलों और सीमा सुरक्षा प्रबंधन से जुड़े मुद्दे विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो गए हैं। वर्ष 2020 के अंत में हुए आम चुनावों के परिणामों को उस समय म्यांमार की सेना ने स्वीकार करने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद फरवरी 2021 में उसने सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया। इसके बाद मिन आंग ह्लाइंग ने सेना प्रमुख (कमांडर-इन-चीफ) और जुंटा नेता के रूप में देश का शासन संभाला। दिसंबर 2025 से जनवरी 2026 के बीच हुए हालिया चुनावों के बावजूद देश के वास्तविक सत्ता संतुलन में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया, क्योंकि चुनावों में सेना समर्थित राजनीतिक दल यूनियन सॉलिडेरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी (USDP) ने संसद और क्षेत्रीय प्रतिनिधि सभाओं में 72 प्रतिशत सीटें जीत लीं। इसका नतीजा यह हुआ कि अप्रैल 2026 में नई सरकार के गठन के बाद शासन व्यवस्था का एक नागरिक (सिविलियन) चेहरा उभरता हुआ दिखाई देता है।[3]
यह कहा जा सकता है कि ह्लाइंग के राष्ट्रपति बनने से, उनके नेतृत्व को अब संवैधानिक वैधता के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहले की तुलना में अधिक स्वीकार्यता भी मिलने लगी है। इसके बावजूद, यह घटनाक्रम म्यांमार की राजनीति में एक व्यापक प्रवृत्ति को दोबारा सामने लाता है, जिसमें सेना प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से राजनीतिक पदों पर काबिज होकर नागरिक शासन की व्यवस्था के भीतर अपनी पकड़ को संस्थागत रूप देती है। म्यांमार पहले भी ऐसी परिस्थितियों से गुज़र चुका है। हालांकि, शासन की वैधता के मुद्दे पर अब हालात पहले से कहीं बेहतर होते लगते हैं, शायद इसलिए ह्लाइंग की शुरुआती विदेश यात्राओं को केवल सामान्य कूटनीतिक दौरों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। ये यात्राएं दूसरे देशों से सामान्य कूटनीतिक संबंध बहाल करने और उसे मज़बूत करने के प्रयासों का हिस्सा हैं। यह और भी महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि वर्तमान में देश के भीतर केंद्रीय सरकार की सत्ता और अधिकार को कई विरोधी समूह अब भी चुनौती दे रहे हैं।
फरवरी 2021 के तख्तापलट के बाद से जुंटा सरकार के प्रमुख और जुलाई 2024 से कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य कर रहे मिन आंग ह्लाइंग के नेतृत्व वाले शासन की वैधता पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। केवल पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों ने ही नहीं, बल्कि एक समूह के रूप में आसियान (Association of Southeast Asian Nations—ASEAN) ने भी उनके शासन को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया, चाहे वह चुनाव से पहले की अवधि रही हो या चुनाव के बाद की।[4] इन परिस्थितियों के बावजूद ह्लाइंग ने चीन और रूस की यात्राएं जारी रखीं। तख्तापलट के बाद वे रूस की चार और चीन की दो यात्राएं कर चुके हैं। दूसरी ओर, चीनी मंत्री और वरिष्ठ अधिकारी नियमित रूप से नेपीदॉ (Naypyidaw) का दौरा करते रहे हैं।[5] इसके अलावा, उनकी विदेश यात्राएं सीमित ही रही हैं और उन्होंने केवल दो आसियान सदस्य देशों, थाईलैंड और इंडोनेशिया, की यात्रा की है।[6] राष्ट्रपति पद संभालने के बाद चीन के विदेश मंत्री वॉंग यी ऐसे एकमात्र उच्च स्तरीय विदेशी प्रतिनिधि रहे हैं जिन्होंने म्यांमार का दौरा कर नए राष्ट्रपति से मुलाकात की। वहीं भारत की यात्रा के तुरंत बाद राष्ट्रपति ह्लाइंग ने चीनी राष्ट्रपति शी चिनपिंग के निमंत्रण पर 15 से 19 जून 2026 तक चीन की पांच दिवसीय आधिकारिक राजकीय यात्रा की।[7] यह तथ्य ह्लाइंग और उनकी सरकार की विदेश नीति की प्राथमिकताओं और उसके रणनीतिक झुकाव को सामने लाते हैं। ऐसे में भारत की यात्रा विशेष महत्व रखती है, क्योंकि यह दौरा भारत के निमंत्रण पर हुआ था। इसलिए इसे केवल एक सामान्य राजनयिक यात्रा के रूप में नहीं देखा जा सकता। बल्कि यह म्यांमार की विदेश नीति, अंतरराष्ट्रीय वैधता प्राप्त करने की उसकी आकांक्षा और भारत-म्यांमार संबंधों के भविष्य के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और रणनीतिक संकेत के रूप में देखा जा सकता है।
पिछले पांच सालों से ज्यादा समय से चल रहे गृह युद्ध के दौर में जुंटा और चीन के बीच न सिर्फ द्विपक्षीय संबंध बने रहे बल्कि कई क्षेत्रों में सहयोग और चीन की उपस्थिति बढ़ी ही है। यहां दो प्रमुख उदाहरण दिए जा सकते है—हथियारों की आपूर्ति और सामरिक सहयोग। चीन लंबे........
